Thursday, February 28, 2008

दो रूपये



बत्ती
लाल हुई
गाड़ी रुकी
और फिर हर रोज़ की तरह
वो सारे बेबस हाथ
रोती बिलखती आत्माओं
के साथ
खिड़कियों पर आकर थम गए ।
किसी ने मुह फेर
अनदेखा किया
तो किसी ने
हाथ दिखाते कहा
'आगे बडो '।
उन लाचार आंखो
को उनके जीवन की
झांकिया देखने वाला शायद
ही कोई दर्शक मिलता होगा ।

ऐसे मे एक कमज़ोर कमउम्र
मेरे हिस्से मे भी लिखा था आज ।
प्रथा को बरकरार रखते हुए
गुप्पी साधे
हाथ फेलाए
मेरे द्वार पर खड़ा हो गया ।
उम्र लगभग पाँच साल
न्यूनतम वस्त्र
गले मे एक माला
हाथ मे कटोरा
बिखरे बाल
बहती हुई नाक
धूप में झुलसा बदन
और वो आँखे ......
जो इस उम्र में भी
अनगिनत कहानियाँ सुना जाती हैं ।

हमदर्दी से जेब मे
दो का सिक्का खोजता हाथ भी सोचता
है की आख़िर आज आता ही क्या है दो रूपये में ?
वैसे ये नन्ही जान भी
कहा तक समझती होगी
मेरे दो रूपये जुटेंगे तो
घूम फिर के किसी
की दारु की बोतल पर ही ।

इसमे इसका भी
क्या दोष ?
कंगूरे के तले पैदा
होने क बजाय
बस एक झोपडे के छप्पर
में आँख खोली थी ।
और तब से रोना
शुरू किया था जो आज तक
बंद नही हो पाया है ।
तपती सड़क पर
भूखे पेट तरसते
इन बच्चो से
आख़िर भूल कहाँ हुई होगी ?
मुझमे और इनमे अन्तर
कब आया ?
जन्म के बाद
पहला शब्द
क्या 'माँ' नहीं निकला होगा ?
तभी खामोशी
को तोड़ती एक आवाज आई -
'साहब ... पैसे दो ना !!!'

Tuesday, February 26, 2008

दो कश्तियाँ




कोई
है जो चाहता था
की हम मिले
भीड़ से तुझे उठाने को
संयोग का नाम तो कभी ना दू ।
कहते है दोस्ती और गहरी दोस्ती
में गंभीर वक्त मात्र का फासला है ।
गंभीर ही तो था -
रंगमंच पे पहली बार होने का भय ।
आधे मंच पर तू था और आधे पर मैं
इस विश्वास में की तालियों की गड़गड़ाहट
ही अब उतार पाएगी हमे ।
बाहर निकल कर तुझे
सीने से लगाने में सुकून मिला
केवल तूने महसूस किया
जो मेरे दिल मे था ।
"साथ है तो दुनिया जीतेंगे"
और दोस्ती ...
वो तो बिन कहे गहरी जो हो गई थी ।

वक्त के साथ साथ पता चला
की तू हर वक्त समस्याओ मे उलझा है
अब समस्याए तुझे घेरती है
या तू समस्याओ को घेरता है
फलस्वरूप मुझे तेरे साथ
रहने के मौके निरंतर मिलते रहे।

रात
रात तक टंकी पर बैठना
आखरी रात जग कर पढ़ना पढ़ाना
सीडियों पे आते जाते लोगो को परेशान करना
क्लास मे सोना
उधार माँगना
सडको पे चीखना चिलाना
घर पे छुपना छिपाना
सब तो साथ मे किया था ।

फिर युही किसी की नज़र लग गई ।
हँसी , झूठी मुस्कान मे
बकबक , मौन मे
और साथ , ... दिखावे मे ।
हम , तू और मैं मे
ऐसे तू और मैं मे जो एक कश्ती मे ना थे ।
चीज़े इतनी जल्दी और इस कदर बदलेंगी
किसने सोचा था ।

सोचा तो बस ये की
"साथ है तो दुनिया जीतेंगे"
दूरियां भले ही ना मिटे
रंग
चाहे फीके दिखे
वो वक्त आए ना आए दुबारा
मैं ज़रूर रहूंगा हर वक्त ।
और दुनिया तो जीतनी है मेरे दोस्त
फरक सिर्फ़ इतना होगा
की पूर्वी तेरी और पश्चिमी मेरी ।

...... रंगमंच की ही तरह ।

Saturday, February 23, 2008

अंतर्मन




एक
द्वंद में उलझा हुआ
एक आग में झुलसा हुआ
अंतर्मन खड़ा है आज
किस बात पर अडा है आज
कभी सूर्य सा उज्जवल है ये
कभी छाया काली रात सा
है ख़ुद में सवाल सा
चट्टान में दरार सा
अपने आप में उलझा हुआ
अपनी आग में झुलसा हुआ
हर चक्रवियु को भेदने की जिद पर अडा है आज
फिर सम्मुख अंतर्मन खड़ा है आज ।


- कृती

Thursday, February 21, 2008

बोलो ना कब पीयोगे ?

'आज मेरा मैच था । '
'तुम्हे पता है एक बार पी लेनी चाहिए ।'
'पी लेनी चाहिए ?'
'हाँ भई पीकर एक दिन टल्ली हो जाओ पूरे । पीकर ना इंसान सिर्फ़ सच बोलता है , दिल मे बसा सब कुछ बाहर आ जाता है । '
'तो तुम्हे लगता है मैं तुमसे झूठ बोलता हूँ । '
'अरे ये कब कहा मैंने । तुमसे अच्छा कोई हो सकता है भला । '
'तो फिर क्या जरुरत पीने की । '
'ओहो जान , कंफेर्मेशन भी तो कुछ होता है । '
'मतलब तुम्हारी कंफेर्मेशन के लिए मुझे थोडी पीनी ही पड़ेगी । '
'
थोडी नही.....टल्ली ....टल्ली होना पड़ेगा । '
'एकदम टल्ली ? '
'हाँ एकदम टल्ली , जब मेरे साथ हो तब ही । '
'अकेले अकेले ?'
'चलो मैं भी पी लुंगी , हम दोनों टल्ली हो जायेंगे । '
'मगर दोनों हो गए , तो तेरी कंफेर्मेशन का क्या ?'
'अरे हाँ , ये तो दिक्कत हो जायेगी । मतलब अब तुम्हे दो बार पीनी पड़ेगी । एक अकेले और एक मेरे साथ । '
'हाँ पढ़ाई-लिखाई छोड़ के दारु की भट्टी ही खोल देता हूँ । '
'अरे सीरियसली ... मजाक नही । '
'अच्छा बाबा , जब तुम्हारे साथ होऊंगा तो एक दफ्फे पी लूँगा ...एकदम अच्छे से ...'
'ये की ना बात '
'एकदम टल्ली'
'सीख रहे हो । '
'और फिर इतने नशे मे सुत्भुत तो होगी नही । ऐसे मे दूर दूर तक तुम्हारे सिवाय कोई होगा भी नही, तो मैं कुछ ऐसी वैसी हरकत कर बैठु तो ....'
'तुम अपने किसी मैच के बारे मे बता रहे थे ना ?'

Sunday, February 17, 2008

मैं समझता हूँ !






आश्चर्य करता हूँ
पिछले १८ सालो मे १८०० से अधिक
बार घुट-घुट कर आंसू बहा चुकने वाली
इन आंखो के पीछे से दुनिया कैसी दिखती होगी



इतने पानी के बाद तो
मैले से मैला पत्थर भी साफ हो उठता है
और फिर मेरे जैसा व्यक्ति भी
उसके चाहते हुए
बिना कहे सब समझने लगता है
वो कहा करती थी
'प्यार मे शब्दों की कोई जगह नही होती '
और शायद इसीलिए उसका शब्दकोष
हमेशा से मुझे छोटा प्रतीत होता था



दिखाई भी देने लगा था मुझे
उसके नाज़ुक कंधो पर घर का भार
मौन का तूफान कही अपना
असर दिखा जाए
सोच कर मैं बहुत बोला करता था
दुनिया भर की बातें किया करता था ।
लेकिन कहना तो बस चाहता था
"मैं समझता हूँ !"



बचपन से लड़की होने का
ठप्पा लिए
अपने रिश्तेदारो से लड़ते हुए
समाज मे अपना अस्तित्व बनाने
की कोशिशो के बाद टूट कर
वो मुझसे मिला करती थी
उन थकी आंखो को देख कर
मैं इस ख्याल से निशब्द रहता था की
"मैं समझता हूँ !"



गलियों के लोफरों का पीछा करना
राह
चलते किसी का भी छेड़ना
इन सब की तो उसको आदत सी हो गई थी
हमउम्र से लेकर अपने पिता तक के उम्र
वाले मानो सब इंसानियत खो बैठे हो
मोहल्ले, बसस्टैंड , कॉलेज ,
सडको, गलियों की
लाखो वासनाओं की निगाहों
से बचकर सीधी वो मेरे पास आती थी
ऐसे मे कब कह पाता की
"मैं समझता हूँ !"



फिर एक दिन अचानक से
माँ की तबियत बिगड़ गई
हौसला बाँधने वाला नजदीक कोई था
आसुओ की धार बही
और बहती चली गई
मेरा ना कहना ना होने मे परिवर्तित हो गया
और तुमने अपने सपनो का
गला दबाते हुए ये फ़ैसला ले लिया
"तुम मुझे छोड़ दो "



मैं तुम्हारे दुर्लभ शब्दों में खोया
वक्त की मार खाई हुई उन
लाचार और बेबस आंखो को देखता रहा
और आज भी ना कह पाया की
"मैं समझता हूँ ! "



तुम ही तो कहा करती थी -
"प्यार मे शब्दों की कोई जगह नही होती "



- सूर्या

Saturday, February 16, 2008

स्वागत है आपका

सुप्रभात !!
जी हाँ सुप्रभात । यहाँ की येही बात सब से अनोखी है । यहाँ सूर्य पर हर सूर्यवंशी एक दूसरे को सुप्रभात ही कह पाता है।यानी पृथ्वी की तरह यहाँ रात-दिन का चक्रव्यु नही चलता है । अपार रौशनी। अत्याधिक तप। और निरंतर काम। इस ब्रहमांड के लिए यहाँ निरंतर उर्जा बनाईं जाती है ।
आपको ताज्जुब हो रहा होगा की यहाँ भी हिन्दी भाषा कैसे ? दरअसल ये भाषा लगभग ६००० हज़ार वर्ष पहले एक सूर्यवंशी द्वारा ही आपकी पृथ्वी पे लायी गई थी । जिसका श्रेय आप सभी मानव गर्व से लेते है । खैर इस बात को मुद्दा बनाना ना ही हमने तब आवश्यक समझा था और ना ही हम अभी समझते है ।

ज्ञान ...... अधूरा ज्ञान आपको यहाँ तक खीच लाया है । सब जानने की , सब समझने की मानव प्रकृति - केवल एक ही ऐसा गुण जो सूर्यवंश का आप लोगो ने अभी तक सही रूप में संभाल रखा है ।

सबसे पहले मैं आपको अपना सही परिचय दे दू । मेरी बातो से शायद मैं आपको एक सूर्यवंशी ही प्रतीत होऊ , मगर आप ही की तरह मैं भी पृथ्वी से आया एक मानव हूँ । बस आप से कुछ समय पहले यहाँ आ गया था और इस कारण अब आते हुए अपने परिजनों का मुझे मार्गदर्शक बना दिया है । पहले तो मैंने साफ मना कर दिया था पर जब कप्तान की उपाधि का लोभ दिया तो मैंने सोचा आख़िर किसी को तो बनना ही है और फिर हममे कौनसी कमी है । तो इस तरह हम बन गए यहाँ के कप्तान उर्फ़ कैप्टेन सूर्या ।

तो मुद्दे की बात ये है की हम सभी यहाँ एक खोयी हुई तमन्ना ढूँढ रहे है या कुछ लोग उसको जीवन का अवशेष भी कहना पसंद करे । और आपकी एक और ग़लतफहमी दूर किए देता हूँ, वो रहस्य यहाँ ज़रूर है लेकिन मेरे पास नही । मैं आप ही की तरह उसी की तलाश में घर से निकला था और आज तक अकेला भटकता रहा । चलो अब कम से कम साथ तो हो गया है । सारे सूर्यवंशी काम में लगे रहते है तो हम जैसो के लिए यहाँ अकेला रहना दुश्वार है । अब हर मौके पे यार लोग बतिया तो सकेंगे । बड़ा वक्त हुआ किसी अपने से बात किए हुए ।
खैर अब तो मिलना बना रहेगा ।



स्वागत है आपका सूर्य पर !!!!

रास्ता भटक जाए तो पूछने में संकोच ना कीजियेगा ।
कैप्टेन सूर्या

 

Design by Amanda @ Blogger Buster